Monday, 2 January 2017

नारी और धर्म



एक बार देवाधिदेव महेश्वर के पूछने पर गँगा आदि पवित्र नदियों के सामने पवित्रता शिरोमणि श्री पार्वती उमा ने स्त्री धर्म का वर्णन करते हुए कहा, देवी मुझे स्त्रियों के धर्म का जैसा ज्ञान है उसके अनुसार उसका विधिवत वर्णन करती हूँ

तुम घ्यान देकर सुनो विवाह के समय कन्या के भाई बंधु पहले ही उसे स्त्री धर्म का उपदेश कर देते हैं ! जबकि वह अग्नि के समीप आपने पति की सहधर्मनी बनती है ! जिसके स्वभाव स्वभाव बातचीत और आचरण उत्तम हो, जिसको देखने से भी पति को सुख मिलता हो, जो आपने पति के सिवा किसी पुरुष में मन नही लगाती हो और स्वामी के समक्ष सदा प्रसन्नमुख बनी रहती हो, वह स्त्री धर्माचरण करने वाली मानी गयी है, जो साध्वी स्त्री अपने स्वामी को सदा देवतुल्य समझती है, वही धर्मपरायण और वही धर्म के फल की भगिनी होती है !  जो पति की देवता समान सेवा शुश्रषा और परिचर्या करती, पति के सिवा और किसी से हार्दिक प्रेम नही करती, कभी दुखी नही होती तथा उत्तम व्रत का पालन करती है ! पुत्र के मुख की भाँति स्वामी के मुख की ओर सदा निहारती रहती है और नियमित आहार का सेवन करती है ! वह साध्वी स्त्री धर्माचरिनि होती है ! पति और पत्नी इस मंगलमय दामपत्यधर्म को सुनकर जो स्त्री धर्मपरायण हो जाती है, वह पति के समान व्रत का पालन करने वाली पतिव्रता है ! पति और पत्नी को यह सहधर्म रूप धर्म, परम मंगलमय है !



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