Monday, 12 December 2016

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Saturday, 10 December 2016

मन को दुर्बल ना बनने दें

सिद्धि का आधार शक्ति माना गया हैं। संसार का कोई उद्योग, कोई भी पुरुषार्थ और कोई भी कार्य शक्ति के बिना नहीं किया जा सकता। कोई बड़ा ही नहीं एक साधारण और सामान्य काम में भी शक्ति की आवश्यकता पड़ती है। अशक्त मनुष्य संसार में कुछ भी नहीं कर सकता।

संसार में प्रधानतः दो शक्तियाँ काम करती हैं। एक शारीरिक-बल दूसरा मानसिक-बल आगे की अन्य शक्तियाँ-जैसे बौद्धिक-बल आध्यात्मिक अथवा आत्मिक-बल भी पूर्वोक्त दो बलों के आधार पर ही पाये ओर विकसित किये जाते हैं।

शारीरिक-बल और मानसिक-बल में भी मानसिक-बल की प्रधानता हैं। शारीरिक-बल का अपने-आपमें कोई अधिक महत्व नहीं है। मनोबल का सहयोग पाये बिना शारीरिक-बल निकम्मा बना रहता है। बहुत बार देखा जा सकता है कि शारीरिक-बल कम होने पर भी लोग मनोबल के आधार पर बहुत से काम कर जाते हैं। शरीर-बल प्रधान सैनिक जिनका मानसिक-बल निर्बल होता है। मनोबल प्रधान और इम्यून शारीरिक-बल वाले सैनिकों से परास्त हो जाते है। जंगल में शेर की तुलना में हाथी, गैंडे, सुअर आदि बहुत से जानवर शरीर-बल में बहुत अधिक होते हैं, किन्तु मनोबल की कमी के कारण शेर से डरते ओर उसका आतंक मानते रहते हैं। वास्तविक बल मनोबल ही होता है-शारीरिक-बल तो मात्र यांत्रिक बल ही होता हैं

शरीर में क्षमता होते हुए भी जब मनुष्य का मन असहयोगी हो जाता है तो वह जरा देर भी काम नहीं कर सकता। मन में उत्साह ओर सहयोग होने पर यदि एक बार शरीर थका भी हो तो भी मनुष्य बहुत देर तक काम करता रहता है। शरीर की सारी क्रियायें मन की सहायता से ही सम्पादित होती है।

बौद्धिक-बल उत्पन्न करने के लिये भी मानसिक अभ्यास की आवश्यकता होती है। मनुष्य की बुद्धि का विकास अध्ययन, अनुभव और विषय में गहरे पैठने से होता है। जिसका मन निर्बल है, असहयोगी या उत्साह हीन है, वह न तो अध्ययन का परिश्रम कर सकता है, न सजग रहकर अनुभव संचय कर सकता है। और न उत्साहपूर्वक किसी विषय में गहरे पैठ सकता है। यदि वह यह सब करेगा भी तो मानसिक सहयोग के अभाव में कुछ लाभ नहीं उठा सकता।

न जाने कितने उत्साह अथवा अभिरुचि से रहित मन वाले लोग वर्षों पड़ते रहते हैं, नौकरी ओर व्यापार करते हैं, किन्तु प्रगति के नाम पर एक कदम भी आगे नहीं बड़ पाते पूरी सिद्धि तो उनके लिए असम्भव होती है। मन का असहयोग, विद्रोही, निरुत्साही, चंचल आदि होना उसकी निर्बलता के ही लक्षण होते हैं।

जिन मनुष्यों के मन बलवान और सतेज होते हैं, वे कम समय में ही पर्याप्त विकास कर लेते हैं। जो काम हाथ में लेते हैं, उत्साह और अभिरुचि से करते है। इस गुण के कारण उनकी ग्रहणशीलता भी बड़ी-बड़ी रहती है। कम-कम से ज्ञान ओर गुणों को हृदयंगम करते चले जाते हैं। मनोबली लोगों का आत्म-विश्वास बड़ा प्रबल होता है। उनकी संसार का काम कठिन ओर दुस्सह मालूम ही नहीं होता। आत्म-विश्वास के कारण वे अपने को हर काम के योग्य समझा करते है। जो भी काम उन्हें सौंप दिया जाता है, उसे पूरा करके दिखलाते हैं।

आध्यात्मिक विकास तो मनोबल के अभाव के में असंभव है। आध्यात्मिक विकास के लिये वृत्तियों ओर इन्द्रियों पर नियन्त्रण करना होता है। यदि मन बलवान ओर स्वरूप है तो उसकी सहायता से वृत्तियों और इन्द्रियों की वश में किया जा सकता है। यदि मन कमजोर और अस्वस्थ है तो मनुष्य की वृत्तियाँ शासन-हीन हो जायेंगी। वे अपनी सत्ता स्वतन्त्र कर लेंगी। तब किसी दशा में भी उन्हें वशवर्ती नहीं किया जा सकता।

आध्यात्मिक विकास के लिये अनेक तरह के नियम, संयम और व्रतों का निर्वाह करना पड़ता है। बहुत-सी साधनाओं में उतरना पड़ता हैं साधना ओर संयत का यह कार्यक्रम केवल शारीरिक-बल के आधार पर नहीं किया जा सकता। इसके लिये मनोबल की आवश्यकता होती है। जिसका मन शक्तिशाली और अनुकूल होता है, वह किसी भी विकार, वेग अथवा उद्वेग पर आसानी से नियंत्रण ला सकता है। जिसका शरीर शक्तिशाली हो पर मन निर्बल हो तो ऐसे आदमी की आसुरी प्रवृत्तियाँ बड़ी प्रबल रहती है। वह तो अपने आवेशों और विकारों को जरा देर भी नहीं रोक सकता। संसार के सारे शासन, अनुशासन, नियम और संयम मनोबल के आधार पर सफल बनाये जा सकते है, शारीरिक-बल के आधार पर नहीं। किसी भी क्षेत्र की सफलता के लिये मानसिक-बल की अनिवार्य आवश्यकता है। उसे जागृत और विकसित करते ही रहना चाहिये।

निर्बल मन वाले कोई बड़ा काम तो दूर सामान्यतम कामों में भी घबरा जाते है। कोई भी प्रसंग उपस्थित होते ही वे भय, आशंका ओर सन्देह के वशीभूत हो जाते हैं, फिर चाहे उसे उस प्रसंग में भय, आशंका अथवा सन्देह का कारण हो या न हो। वास्तविकता यह है कि भय का कारण प्रसंग अथवा परिस्थितियों में नहीं होता, उसकी जड़ मनुष्य के अपने निर्बल मन में ही होती हैं। हृदय से ही होता है। इनका हेतु वह मानसिक कमजोरी ही होती है, जो किन्हीं भूलों अथवा भ्रमों से पैदा  हो जाती है

यदि भय और आशंकाओं का सम्बन्ध मनुष्य की हृदय-स्थिति से न होता और उनका निवास प्रसंग अथवा परिस्थितियों में होता तो वह उस स्थिति में सभी मनुष्यों पर समान रूप से प्रतिक्रियाएँ होना चाहिये। जब ऐसा होता नहीं, किसी भयानक परिस्थिति को देखकर कहाँ कोई एक बुरी तरह डर कर घबरा कर भागने का रास्ता खोजने लगता है, वहाँ कोई दूसरा उसी परिस्थिति में अपने संतुलन ओर साहस के आधार पर वीरतापूर्वक उसका सामना करने के लिये उत्साहित हो उठता है। यह अन्तर परिस्थिति का नहीं केवल मनःस्थिति का होता है। जिसका मन निर्बल और कायर होगा, उसका घबरा जाना स्वाभाविक है। जिसका मनोबल बढ़ा-चढ़ा होगा, उसके मन में भय अथवा पलायन का भाव ही न आयेगा। वह तो ताल ठोक कर टक्कर लेने को उद्यत हो उठेगा।

मनुष्य की सारी बाह्य क्रियाओं की जड़ उसके मन में ही होती है। मनुष्य की शारीरिक क्रियाओं का संचालक मन ही होता है। मन स्वस्थ, बलवान, ओर संतुलित होगा, क्रियायें भी सुन्दर, सतेज ओर व्यवस्थित होंगी। मन निर्बल और अस्थिर होगा, क्रिया-कलाप भी सारहीन और अस्त-व्यस्त होगा।

कारण कोई भी रहे हों, किन्तु जिनके मन क्षीण, निर्बल ओर निस्तेज हो जाते हैं, उनका सारा जीवन भय, आशंकाओं, कट्टरता और संदेहों से भरा रहता है। मनोहीन मनुष्य हर बात में भयानक घटनाओं, सम्भावनाओं और परिणामों की कल्पना किया करते है। उन्हें सब ओर सब जगह अमंगल और अकल्याण ही दिखाई देता है। जिस प्रकार कायर और भीरु सिपाही को मोर्चे पर सिवाय मौत के और कुछ दिखाई नहीं देता, जबकि वहाँ पर विजय, यश और प्रतिष्ठा की भी सम्भावना होती है, उसी प्रकार निर्बल मन वाले को सब जगह असफलता और आशंका ही दीखती रहती है, जबकि सभी क्षेत्रों और कार्यों में दूसरे लोग सफल और कृतकृत्य होते रहते हैं।

निर्बल मन वालों की विचार-धारा प्रतिगामिनी हो जाती है। ऐसा मनुष्य यदि एक सफल और एक असफल आदमी को एक साथ देखता है तो भी वह असफल व्यक्ति की स्थिति से प्रभावित होता। वह सोचता है यदि में भी इस काम को करूँ तो असफल हो जाऊँगा। उसका विश्वास उस सफल व्यक्ति पर नहीं जाता ओर न अपने लिये उसे उदाहरण ही बना पाता है। कायर व्यक्ति जिस प्रकार मैदान छोड़कर भागने वालों को अपना आदर्श बनाता है, मोर्चे पर डटने वालों को नहीं, उसी प्रकार मनोहीन व्यक्ति भी असफल, अकर्मण्य और अग्राह्य उदाहरणों को अपना आदर्श बनाता है।

निर्बल मन वाला व्यक्ति स्वभावतः निराशावादी होता है। उसे पग-पग पर अनर्थ ही दिखाई देता हैं। साधारण सी बीमारी-जैसे सर्दी-जुकाम खाँसी या बुखार आ जाने पर बुरी तरह घबरा उठता है। सोचने लगता हैं कहीं सर्दी बढ़कर निमोनिया न बन जाये। कहीं ऐसा न हो कि खाँसी बुखार मिलकर हमें यक्ष्मा कर दें। जरा-सी चोट लग जाने पर उसे ऐसा लगता है मानो उसकी हड्डी टूट गई है। किसी ऐसी रंग में जरा-सी भूल हो जाने पर ऐसा घबरा जाता हैं। जैसे उसकी बरखास्तगी का फरमान आने वाला हो। व्यापार में जरा-सा घाटा आते ही उसे अपनी घर-मकान नीलाम होता दिखाई देता है। निराशा के दोष के कारण उसे अनर्थ के सिवाय वह विचार कदाचित ही आता है कि मनुष्य की जीवनी शक्ति बड़ी बलवती होती हैं यह जरा-सी बीमारी मेरा क्या बिगाड़ सकती है, मैं इसे उपचार, आहार-बिहार और नियम, संयम पर जड़मूल से नष्ट कर दूँगा।

नौकरी में भूल हो जाने पर वह यह नहीं सोच पाता कि धोखे से गलती हो गई, आगे के लिये सावधान रहूँगा। सारी स्थिति सुधार लूँगा। व्यापारिक घाटे के प्रसंग में वह इस प्रकार सोच सकने से बाधित रहता है-कि व्यापार में हानि लाभ तो चलता ही रहता हैं। आज यदि हानि हो गई तो आगे लाभ भी होगा। मैं परिश्रम, पुरुषार्थ, सावधानी और साख के बल पर सारी कमी पूरी कर लूँगा। इस प्रकार अपनी निराश भावना के कारण मनो-हीन व्यक्ति प्रकाश के स्थान पर अन्धकार ही देखा करता है।

मानसिक दौर्बल्य अथवा मनोहीनता मानव-जीवन के लिये भयानक अभिशाप है। अदम्य शारीरिक शक्ति और प्रचुर साधन होने पर भी मनोहीन व्यक्ति जीवन में असफल ही रह जाता हैं। जबकि मनोबली व्यक्ति सामान्य शारीरिक क्षमता और साधनों की कमी में भी अपने साहस, उत्साह और संलग्नता के बल पर क्षमता और साधनों की वृद्धि कर लेते हैं और संसार के सफल व्यक्तियों की पंक्ति में अपना स्थान बना लेते है।

यदि किन्हीं कारणों से कोई मानसिक दौर्बल्य का बन्दी बन गया है तो ऐसा नहीं कि उसका यह अभिशाप दूर नहीं हो सकता। अवश्य ही दूर हो सकता है। प्रयत्न द्वारा संसार का हर काम सम्भव हो जाता है। यदि कोई अपने में मनोबल की कमी पाता है तो उसे चाहिये कि वह धीरे-धीरे उन कामों में पड़ना आरम्भ करें, जिनसे उसे भय लगता है ओर अपनी सारी प्राप्त एवं प्रबुद्ध शक्ति को लगाकर पुरुषार्थ करें। असफल होने पर जरा भी निराश न हों और बार-बार प्रयत्न करते चलें। इस प्रकार धीरे-धीरे अभ्यास द्वारा उसका मनोबल बढ़ने लगेगा और एक दिन वह सुयोग्य बन जायेगा।

मीटर, रेल, और हवाई-जहाज चलाना सीखने वाले आरम्भ में डरते हैं किन्तु तब भी वे लगनपूर्वक उस काम में लगे ही रहते हैं। धीरे-धीरे उनका मनोबल बढ़ता जाता है और एक दिन वे इतने आत्म-विश्वासी हो जाते हैं कि बिना किसी शंका के दुरूह स्थानों पर भी अपना यान चलाते चले जाते हैं।

मनोबल मनुष्य का प्रधान बल है। इसकी वृद्धि किए बिना जीवन के क्या सामाजिक, क्या आर्थिक और क्या आध्यात्मिक किसी भी क्षेत्र में सफलता नहीं मिल सकी। अस्तु इस प्रधान बल को निरन्तर बढ़ाते ही रहना चाहिये।

अच्छाई या बुराई ?

मैं आपसे अपनी कुछ thoughts share करना चाहता हूँ. एक सवाल से शुरू करते हैं.
Ques. दुनिया में अच्छाई अधिक है या बुराई ?

क्या उत्तर मन में आया ?
मैंने यही प्रश्न कई लोगों से पुछा, मुझे mixed answers मिले कुछ ने अच्छाई को अधिक बताया तो कुछ ने बुराई को ! पर ज्यादातर लोगों ने अच्छे को ही अधिक बताया , और मुझे भी ऐसा ही लगता है।

चलिए इसे ऐसे देखते हैं ….
आप कितने अच्छे लोगों को जानते हैं …. इसमें दुनिया भर के लोगों को ना लेकर बस उन्हें लीजिये जिन्हे आप personally जानते हों ….
मेरी अच्छे लोगों की list तो बहुत लम्बी है और बुरे में बस कुछ एक्का -दुक्का लोग ही है.
Of course , कौन अच्छा है और कौन बुरा ये बहुत subjective चीज है , जो आपको अच्छा लगता है वो किसी और को बुरा लग सकता है and vice-versa. पर यहाँ आपको बस ये देखना है कि जो आपको अच्छा लगता है वो अच्छा है और जो आपको बुरा लगता है वो बुरा है।

तो आपकी list कैसी बनी ?
मुझे लगता है , ज्यादातर लोगों की list में अच्छे लोग ही अधिक होंगे … यानि जब हर किसी की list में अच्छे लोग जयादा हैं तो दुनिया में अच्छाई भी अधिक होगी …isn’t it?

Definitely, अच्छाई अधिक है. इस दुनिया में अच्छे लोगों की कोई कमी नहीं है पर फिर भी हर तरफ , अखबारों में …news channels पर …. गली–चौराहों पर बुराई का ही बोल-बाला क्यों है ??

दुनिया में अच्छाई अधिक होने के बावजूद बुराई अधिक क्यों जान पड़ती है …. ऐसा क्यों है कि मुट्ठी भर लोगों के बुराई की चीख लाखों लोगों के अच्छाई की आवाज़ को दबा देती है ?
Ans. आज हम बुरी ख़बरों में इतना उलझे हुए हैं कि हमारा ध्यान बुराई से हटता ही नहीं, चंद लोगों की बुराई को ही हमें बार-बार दिखाया जाता है. उस पर चर्चाएं होती हैं और इसी वजह से पूरे माहौल में ही बुराई घुल सी गयी है. और जैसा कि Law of Attraction कहता है – ” सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में हम जिस चीज पर ध्यान केन्द्रित करते हैं उस चीज में आश्चर्यजनक रूप से विस्तार होता है ।” और यहाँ तो कोई व्यक्ति विशेष नहीं पूरा का पूरा देश ही बुराई पर अपना ध्यान लगाये बैठे है. और यह भी एक बड़ी वजह है कि हमें आये दिन और अधिक बुराई देखने को मिलती है !

Ques. सोचिये , अच्छाई अधिक है तो भी बुराई के विस्तार को रोक नहीं पा रही … क्यों ?
Ans. क्या हम भी इसके जिम्मेदार हैं ?
मुझे लगता है हैं-
जब किसी restaurant में हमें ख़राब dinner serve होता है तो हम दस जगह इस बारे में बताते हैं लेकिन जब कोई waiter हमारे साथ बहुत सलीके से पेश आता है तो इस बात को ज्यादा लोगों से share नहीं करते …जब कोई सरकारी कर्मचारी हमारा काम करने में देर लगता है तो हम सबसे इसका रोना रोते हैं पर जब वही कर्मचारी ये काम efficiently कर देता है तो हम इसकी बात कहीं नहीं करते …ज़ब हमें हमारे colleague में कोई कमी दिखती है तो हम उसकी gossip तो कर लेते हैं पर दिल खोल कर उसकी तमाम अच्छाईओं के बारे में बात नहीं करते… ये बुराई को बढ़ाना नहीं तो और क्या है?

Friends, शायद सालों से feed करी जा रही negativity की वजह से हम कुछ ऐसे programmed हो गए हैं कि हम inherently अच्छे होने के बावजूद बुराई की तरफ आकर्षित होते हैं उसका प्रचार करते फिरते हैं, हमें इस programming को बदलना होगा, हमें सबकी नहीं बस अपनी जिम्मेदारी लेनी होगी, deliberately हमें अच्छाई  को बढ़ावा देना होगा.

क्यों न हम बुराई की चीख को अच्छाई की गूँज से दबा दें … क्यों न हम हमारे साथ होने वाले हर एक positive experience को amplify कर दें … उसका शोर मचा दें … इतना कि अच्छाई की उस गूँज में बुराई की चीख सुनाई ही न पड़े !
हो सकता है आप कहें कि अगर अखबारों में , news channels पर negative news आती है तो इसमें हम क्या कर सकते हैं ???

Actually मैं इसके लिए कुछ करने के लिए कह भी नहीं रहा , मैं तो बस इतना कहना चाहता हूँ कि आपके साथ जो कुछ positive हो रहा है , आपको जो कुछ भी positive पता चल रहा है , चाहे वो किसी भी चीज के बारे में हो ,वो कोई व्यक्ति हो , कोई किताब हो , कोई movie हो या कोई बात , उसे अपने तक ना रखें उसे लोगों से बांटें … उसका विस्तार करें … मैं आपसे बुरी खबर को रोकने के लिए नहीं कह रहा मैं तो बस आपसे अच्छी ख़बर को बढ़ाने की appeal कर रहा हूँ ….


क्योंकि ये जो बुरी खबर है वो सिर्फ एक खबर नहीं है वो एक तरह की बीमारी है और जब किसी बीमारी को लम्बे समय तक address नहीं किया जाता है तो वो cancer बन जाती है , हमें इस बुराई की बीमारी को कैंसर नहीं बनने देना होगा …हमे इसका इलाज करना होगा और इसका इलाज एक ही है ……… अच्छाई की गूँज !

Tuesday, 15 November 2016

बुद्धि का विकास

हमने बचपन में शेर और खरगोश की कहने पढ़ी थी .उसमें खरगोश अपनी सूझ-बुझ से शेर को कुएँ में कूदने को विवश कर देता है और जंगल के समस्त जानवरों को इस खूंखार शेर के आतंक से मुक्ति दिला देता है .कहानी का conclusion इस प्रकार दिया जाता है -“जिसके पास बुद्धि है ,उसी के पास शक्ति है ,देखा आपने !!!!खरगोश की वजह से दुर्दांत शेर का वध किया गया | ”

मनुष्य और जानवरों के बीच इतना अंतर है की मनुष्य के पास बुद्धि नाम की एक power है जो जानवरों के पास नहीं है और बुद्धि के बल से ही मनुष्य सिंह और हाथी जैसे विशालकाय जानवरों को भी अपने वश में कर लेता है |क्या आप जानते है बुद्धि हमारे लिए कितनी आवश्यक है और इस दुनिया में केवल आधे से ज्यादा लोग ही जानते है | जानिए आखिर क्या मामला है
…………….
बुद्धि एक परम तत्व है ,यह ईश्वर का दिया हुआ अपना साथी है जो हर अच्छे-बुरे समय में आपका साथ देता है | बुद्धि ही ऐसी power है जो इंसान को बुराई में जाने से रोकती है और मन को विकार से दूर रखने के लिए हर इन्द्रियों को अपने नियंत्रण में रखती है |क्या आप जानते है इस दुनिया में ऐसा कोई इंसान नहीं हुआ जो अपनी बुद्धि के विकास के बिना सबके दिल को जीत लिया हो | आखिर ऐसी क्या बात है इस दुनिया में बहुत से ऐसे मनुष्य है जो अपनी बुद्धि को पूरी तरह से प्रयोग नहीं करते | निष्कर्ष पर जाने तो वे अपनी ही बुद्धि को दबा देते है ऐसा तब होता है जब इंसान के भीतर किसी को गालियाँ ,अपमान, शराब ,नशे ,पीटना जैसे काम करने के विचार पनपते है, तब बुद्धि इंसान को इन कुविचारो पर 3 या 6 बार प्रश्न करने विवश करती है,अगर मानो वो मन में सोचे की “अगर मैंने उसका जानबूझ अपमान किया तो मुझे कोई इससे लाभ नहीं मिलेगा “ “अगर मैंने शराब, drug ली तो मेरे स्वास्थ का क्या होगा और फालतू में जिंदगी क्यूँ बर्बाद करू “ ऐसे विचार बुद्धि से सोच समझ कर परखे जाये तो नीच से नीच इंसान भी ऊपर उठ सकता है यानि उसके जीवन में विकास हो रहा है | इसके विपरीत जब वह किसी लालच में पड़ कर शराब, नशे, जुआ जैसे काम करने लगता है तब ऐसी condition में व्याधियां उसके मन घर जमा लेती है | तब ऐसे में उसकी बुद्धि उसके मन में कुविचारो के नीचे दब जाती है और वह ही उसी को नष्ट करता है |ऐसे मनुष्य को महान उपन्यासकार प्रमचंद ने बिना सिंग का पशु बताया है |


“श्रीमदभगवदगीता में बार बार कहा गया है जिसकी बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है वह व्यक्ति नष्ट हो जाता है उसके दुःखी होने का प्रश्न नहीं उठता |”


इंग्लैंड के महान नाटककार william shakespeare कहते है की “तुम्हारी बुद्धि तुम्हारा गुरु है, बुद्धि एक ऐसा गुरु है जो प्रत्येक पल हमारा मार्गदर्शन करने के लिए उपस्थित रहता है .इस गुरु का मार्गदर्शन प्राप्त करके हम अपने पुरे competion को निधारित कर सकते है और अपने भावी जीवन की समस्त योजनाये बना सकते है |बुद्धि विवेक के सहारे हम छोटे से छोटा और बड़े से बड़ा निर्णय लेकर सही दिशा में अग्रसर हो सकते है |बुद्धि ही हमको यही बता देगा की हम कौनसी प्रतियोगिता की योग्य है तथा हमको उसमे सफल होने के लिए किस प्रकार की तैयारी करनी चाहिए | “


“में आप से कहता हूँ की अगर आप इसका उपयोग जितनी इमानदारी से करेंगे ,तो आपके जीवन में सफलता की भावना उतनी ही अधिक होगी “

चावल का एक दाना

शोभित एक मेधावी छात्र था। उसने हाई स्कूल और इंटरमीडिएट की परीक्षा में पूरे जिले में टॉप किया था। पर इस सफलता के बावजूद उसके माता-पिता उसे खुश नहीं थे। कारण था पढाई को लेकर उसका घमंड ओर अपने बड़ों से तमीज से बात न करना। वह अक्सर ही लोगों से ऊंची आवाज़ मे बात किया करता और अकारण ही उनका मजाक उड़ा देता। खैर दिन बीतते गए और देखते-देखते शोभित स्नातक भी हो गया।

स्नातक होने के बाद सोभित नौकरी की खोज में निकला| प्रतियोगी परीक्षा पास करने के बावजूद उसका इंटरव्यू में चयन नहीं हो पाता था| शोभित को लगा था कि अच्छे अंक के दम पर उसे आसानी से नौकरी मिल जायेगी पर ऐसा हो न सका| काफी प्रयास के बाद भी वो सफल ना हो सका| हर बार उसका घमंड, बात करने का तरीका इंटरव्यू लेने वाले को अखर जाता और वो उसे ना लेते| निरंतर मिल रही असफलता से शोभित हताश हो चुका था , पर अभी भी उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसे अपना व्यवहार बदलने की आवश्यता है।

एक दिन रस्ते में शोभित की मुलाकात अपने स्कूल के प्रिय अध्यापक से हो गयी| वह उन्हें बहुत मानता था ओर अध्यापक भी उससे बहुत स्नेह करते थे | सोभित ने अध्यापक को सारी बात बताई| चूँकि अध्यापक सोभित के वयवहार से परिचित थे, तो उन्होने कहा की कल तुम मेरे घर आना तब मैं तुम्हे इसका उपाय बताऊंगा|

शोभित अगले दिन मास्टर साहब के घर गया| मास्टर साहब घर पर चावल पका रहे थे| दोनों आपस में बात ही कर रहे थे की मास्टर साहब ने शोभित से कहा जाके देख के आओ की चावल पके की नहीं| शोभित अन्दर गया उसने अन्दर से ही कहा की सर चावल पक गए हैं, मैं गैस बंद कर देता हूँ| मास्टर साहब ने भी ऐसा ही करने को कहा|

अब सोभित और मास्टर साहब आमने सामने बैठे थे| मास्टर साहब शोभित की तरफ मुस्कुराते हर बोले –शोभित तुमने कैसे पता लगया की चावल पक गए हैं?

शोभित बोला ये तो बहुत आसान था| मैंने चावल का एक दाना उठाया और उसे चेक किया कि वो पका है कि नहीं ,वो पक चुका था तो मतलब चावल पक चुके हैं|

मास्टर जी गंभीर होते हुए बोले यही तुम्हारे असफल होने का कारण है|

शोभित उत्सुकता वश मास्टर जी की और देखने लगा|

मास्टर साहब समझाते हुए बोले की एक चावल के दाने ने पूरे चावल का हाल बयां कर दिया| सिर्फ एक चावल का दाना काफी है ये बताने को की अन्य चावल पके या नहीं| हो सकता है कुछ चावल न पके हों पर तुम उन्हें नहीं खोज सकते वो तो सिर्फ खाते वक्त ही अपना स्वाभाव बताएँगे|



इसी प्रकार मनुष्य कई गुणों से बना होता है, पढाई-लिखाई में अच्छा होना उन्ही गुणोँ में से एक है , पर इसके आलावा, अच्छा व्यवहार, बड़ों के प्रति सम्मान , छोटों की प्रति प्रेम , सकारात्मक दृष्टिकोण , ये भी मनुष्य के आवश्यक गुण हैं, और सिर्फ पढाई-लिखाई में अच्छा होना से कहीं ज्यादा ज़रुरी हैं।

तुमने अपना एक गुण तो पका लिया पर बाकियो की तऱफ ध्यान ही नहीं दिया। इसीलिए जब कोई इंटरव्यूवर तुम्हारा इंटरव्यू लेता है तो तुम उसे कहीं से पके और कहीं से कच्चे लगते हो , और अधपके चावलों की तरह ही कोई इस तरह के कैंडिडेट्स भी  पसंद नही करता।

शोभित को अपनी गलती का अहसास हो चुका था| वो अब मास्टर जी के यहाँ से नयी एनर्जी ले के जा रहा था|

तो दोस्तों हमारे जीवन में भी कोई न कोई बुराई होती है, जो हो सकता है हमें खुद नज़र न आती हो पर सामने वाला बुराई तुरंत भाप लेता है| अतः हमें निरंतर यह प्रयास करना चाहिए कि हमारे गुणों से बना चावल का एक-एक दाना अच्छी तरह से पका हो, ताकि कोई हमें कहीं से चखे उसे हमारे अन्दर पका हुआ दाना ही मिले।

मौत का सौदागर

1888 की बात है, एक व्यक्ति सुबह-सुबह उठ कर अखबार पढ़ रहा था , तभी अचानक उसकी नज़र एक “शोक – सन्देश ” पर पड़ी। वह उसे देख दंग रह गया , क्योंकि वहां मरने वाले की जगह उसी का नाम लिखा हुआ था। खुद का नाम पढ़कर वह आश्चर्यचकित तथा भयभीत हो गया। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि अखबार ने उसके भाई लुडविग की मरने की खबर देने की जगह खुस उसके मरने की खबर प्रकाशित कर दी थी। खैर , उसने किसी तरह खुद को समभाला, और सोचा , चलो देखते हैं की लोगों ने उसकी मौत पर क्या प्रतिक्रियाएं दी हैं।

उसने पढ़ना शुरू किया, वहां फ्रेंच में लिखा था , “”Le marchand de la mort est mort”यानि , “मौत का सौदागर” मर चुका है”

यह उसके लिए और बड़ा आघात था , उसने मन ही मन सोचा , ” क्या उसके मरने के बाद लोग उसे इसी तरह याद करेंगे ?”

यह दिन उसकी ज़िन्दगी का टर्निंग पॉइंट बन गया, और उसी दिन से डायनामाइट का यह अविष्कारक विश्व शांति और समाज कल्याण के लिए काम करने लगा। और मरने से पहले उसने अपनी अकूत संपत्ति उन लोगों को पुरस्कार देने के लिए दान दे दी जो विज्ञान और समाज कलायन के क्षत्र में उत्कृष्ट काम करते हैं।

मित्रों , उस महान व्यक्ति का नाम था , ऐल्फ्रेड बर्नार्ड नोबेल , और आज उन्ही के नाम पर हर वर्ष “नोबेल प्राइज ” दिए जाते हैं। आज कोई उन्हें “मौत के सौदागर के रूप” में नहीं याद करता बल्कि हम उन्हें एक महान वैज्ञानिक और समाज सेवी के रूप में याद किया जाता है।

जीवन एक क्षण भी हमारे मूल्यों और जीवन की दिशा को बदल सकता है , ये हमें सोचना है की हम यहाँ क्या करना चाहते हैं ? हम किस तरह याद किये जाना चाहते हैं ? और हम आज क्या करते हैं यही निश्चित करेगा की कल हमें लोग कैसे याद करेंगे ! इसलिए , हम जो भी करें सोच-समझ कर करें , कहीं अनजाने में हम “मौत के सौदागर” जैसी यादें ना छोड़ जाएं !!!

Saturday, 12 November 2016

भारत में विमुद्रीकरण का प्रभाव

 केन्द्र सरकार द्वारा कालाधन पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से पांच सौ व एक हजार रूपये के नोट को बंद कर दिये जाने का देश  में जबरदस्त असर देखने को मिल रहा है, नोटो के बंद हो जाने से हर प्रकार का व्यवसाय प्रभावित हुआ है  जिन दुकानों पर दिनभर ग्राहको की लाइन लगी रहती थी वहीं वही दुकानदार ग्राहको के इंतजार में बैठे देखे गये आम जनता को काफी दिक्कतों का समना करना पड़ रहा है कुछ लोग इस फैसले की निंदा कर रहे है तो कुछ लोग इसे सराहनीय भी बता रहे हैं जाहिर सी बात है देश में बहुत बड़ा तबका मध्यम वर्गीय है देश में बहुत बड़े पैमाने पर मिडल क्लास के लोग रह रहें है जिन्हें काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है किसी के पास पैसे हैं किसी के पास नही हैं तो किसी के पास सिर्फ 500 ही हैं ऐसे में परेशान लोग इस फैसले के प्रति रोष प्रकट कर रहें हैं, हालाँकि सबसे बड़ा फायदा भी इन्ही मध्यम वर्गीय के लोगों को होने वाला है दोस्तों आप से बताना चाहूंगा की सरकार को सभी की फिक्र है  सरकार जो भी क़दम उठाती है जनता के हित में उठाती है देश के हित में उठाती है और जिन लोगों को अभी ये बुरा लग रहा है सबसे ज्यादा फायदा उन्हे ही होने वाला है काला धन नष्ट होने के साथ ही देश की GDP बढेगी जिसका फायदा सीधा आम आदमी को होगा मिडल क्लास लोगों को होगा GDP बढ़ने से महँगाई कम होगी जिससे गरीब इंसान कम पैसों में अपना परिवार चला पायेगा और बचा भी पायेगा मकानों की कीमत में गिरावट आयेगी जो ईमानदार व्यक्ति, मेहनत से कमाने वाले लोगों के लिये अच्छी ख़बर है सेविंग पर हेड 2.5 लाख किया गया है जिससे छोटे व्यापारियों  को बहुत बड़ा फायदा होने वाला है..
 मित्रों  आपसे कहना चाहूंगा बस कुछ ही दिनो की बात है आज आप जो परेशानियां झेल रहें है उससे भविष्य में आप ही का फायदा होने वाला है मै चाहूंगा आप लोग सरकार के इस फैसले का सम्मान करे और देश की मजबूत अर्थमेंव्यवस्था बनाने एक जिम्मेदार नागरिक की अपनी भूमिका अदा करें.. 
धन्यवाद !
आपका दोस्त
सौरभ कुमार सोनी 

Wednesday, 2 November 2016

अहंकार छोड़िये सीखना शुरू करिये

धरती पर जन्म लेने के साथ ही सीखने की प्रक्रिया प्रारंभ हो जाती है ज्यों हम बड़े होते जाते हैं, सीखने की प्रक्रिया भी विस्तार लेती जाती है, जल्द ही हम उठना, बैठना, बोलना, चलना सीख लेते हैं। इस बड़े होने की प्रक्रिया के साथ ही कभी-कभी हमारा अहंकार हमसे अधिक बड़ा हो जाता है और तब हम सीखना छोड़कर गलतियां करने लगते हैं। यह अंहकार हमारे विकास मार्ग को अवरूद्ध कर देता है इस बात की चर्चा करते हुए मुझे एक वाकिया याद आ रहा है जिसकी चर्चा यहाँ करना अच्छा होगा।

एक बार की बात है रूस के ऑस्पेंस्की नाम के महान विचारक एक बार संत गुरजियफ से मिलने उनके घर गए। दोनों में विभिन्न् विषयों पर चर्चा होने लगी। ऑस्पेंस्की ने संत गुरजियफ से कहा, यूं तो मैंने गहन अध्ययन और अनुभव के द्वारा काफी ज्ञान अर्जित किया है, किन्तु मैं कुछ और भी जानना चाहता हूं। आप मेरी कुछ मदद कर सकते हैं? गुरजियफ को मालूम था कि ऑस्पेंस्की अपने विषय के प्रकांड विद्वान हैं, जिसका उन्हें थोड़ा घमंड भी है अतः सीधी बात करने से कोई काम नहीं बनेगा। इसलिए उन्होंने कुछ देर सोचने के बाद एक कोरा कागज उठाया और उसे ऑस्पेंस्की की ओर बढ़ाते हुए बोले- ''यह अच्छी बात है कि तुम कुछ सीखना चाहते हो। लेकिन मैं कैसे समझूं कि तुमने अब तक क्या-क्या सीख लिया है और क्या-क्या नहीं सीखा है। अतः तुम ऐसा करो कि जो कुछ भी जानते हो और जो नहीं जानते हो, उन दोनों के बारे में इस कागज पर लिख दो। जो तुम पहले से ही जानते हो उसके बारे में तो चर्चा करना व्यर्थ है और जो तुम नहीं जानते, उस पर ही चर्चा करना ठीक रहेगा।''


बात एकदम सरल थी, लेकिन ऑस्पेंस्की के लिए कुछ मुश्किल। उनका ज्ञानी होने का अभिमान धूल-धूसरित हो गया। ऑस्पेंस्की आत्मा और परमात्मा जैसे विषय के बारे में तो बहुत जानते थे, लेकिन तत्व-स्वरूप और भेद-अभेद के बारे में उन्होंने सोचा तक नहीं था। गुरजियफ की बात सुनकर वे सोच में पड़ गए। काफी देर सोचने के बाद भी जब उन्हें कुछ समझ में नहीं आया तो उन्होंने वह कोरा कागज ज्यों का त्यों गुरजियफ को थमा दिया और बोले- श्रीमान मैं तो कुछ भी नहीं जानता। आज आपने मेरी आंखे खोल दीं। ऑस्पेंस्की के विनम्रतापूर्वक कहे गए इन शब्दों से गुरजियफ बेहद प्रभावति हुए और बोले -

''ठीक है, अब तुमने जानने योग्य पहली बात जान ली है कि तुम कुछ नहीं जानते। यही ज्ञान की प्रथम सीढ़ी है। अब तुम्हें कुछ सिखाया और बताया जा सकता है। अर्थात खाली बर्तन को भरा जा सकता है, किन्तु अहंकार से भरे बर्तन में बूंदभर ज्ञान भरना संभव नहीं। अगर हम खुद को ज्ञान को ग्रहण करने के लिए तैयार रखें तो ज्ञानार्जन के लिये सुपात्र बन सकेंगे। ज्ञानी बनने के लिए जरूरी है कि मनुष्य ज्ञान को पा लेने का संकल्प ले और वह केवल एक गुरू से ही स्वयं को न बांधे बल्कि उसे जहां कहीं भी अच्छी बात पता चले, उसे ग्रहण करें।''

अच्छे विचार : प्रेरणादायक कहानियाँ

अच्छे विचार : प्रेरणादायक कहानियाँ: 1. क्या आपको पता है, जब हाथी का बच्चा छोटा होता है तो उसे पतली एंव कमजोर रस्सी से बांधा जाता है| हाथी का बच्चा छोटा एंव कमजोर होने के कारण ...

Tuesday, 1 November 2016

प्रेरणादायक कहानियाँ

1. क्या आपको पता है, जब हाथी का बच्चा छोटा होता है तो उसे पतली एंव कमजोर रस्सी से बांधा जाता है| हाथी का बच्चा छोटा एंव कमजोर होने के कारण उस रस्सी को तोड़कर भाग नहीं सकता| लेकिन जब वही हाथी का बच्चा बड़ा और शक्तिशाली हो जाता है तो भी उसे पतली एंव कमजोर रस्सी से ही बाँधा जाता है, जिसे वह आसानी से तोड़ सकता है लेकिन वह उस रस्सी को तोड़ता नहीं है और बंधा रहता है| ऐसा क्यों होता है?
ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जब हाथी का बच्चा छोटा होता है तो वह बार-बार रस्सी को छुड़ाकर भागने की कोशिश करता है, लेकिन वह कमजोर होने के कारण उस पतली रस्सी को तोड़ नहीं सकता और आखिरकर यह मान लेता है कि वह कभी भी उस रस्सी को तोड़ नहीं सकता| हाथी का बच्चा बड़ा हो जाने पर भी यही समझता है कि वह उस रस्सी को तोड़ नहीं सकता और वह कोशिश ही नहीं करता| इस प्रकार वह अपनी गलत मान्यता अथवा गलत धारणा (Wrong Beliefs) के कारण एक छोटी सी रस्सी से बंधा रहता है जबकि वह दुनिया के सबसे ताकतवर जानवरों में से एक है|
2. दोस्तों वैज्ञानिकों के अनुसार भौंरे का शरीर बहुत भारी होता है| इसलिए विज्ञान के नियमो के अनुसार वह उड़ नहीं सकता| लेकिन भौंरे को इस बात का पता नहीं होता एंव वह यह मानता है की वह उड़ सकता है| इसलिए वह लगातार कोशिश करता जाता है और बार-बार असफल होने पर भी वह हार नहीं मानता क्योंकि वह यही सोचता है कि वह उड़ सकता है| आखिरकार भौंरा उड़ने में सफल हो ही जाता है|

3. दोस्तों इस जीवन में नामुनकिन कुछ भी नहीं (Nothing is impossible in life), नामुनकिन शब्द मनुष्य ने ही बनाया है| जब टेलीफोन और रेडियो आदि का आविष्कार नहीं हुआ था तो दुनिया और विज्ञान यही मानते थे कि आवाज को कुछ ही समय में सैकड़ो किलोमीटर दूर पहुँचाना नामुनकिन (Impossible) है, लेकिन आज मोबाइल हमारे जीवन का हिस्सा है| इसी तरह जब तक विमान का आविष्कार नहीं हुआ था तब तक विज्ञान जगत भी यही मानता था कि मनुष्य के लिए आकाश में उड़ना संभव नहीं लेकिन जब राइट बंधुओं ने विमान का आविष्कार किया तो यह “असंभव”, “संभव” में बदल गया

4. इसी तरह क्रिकेट की बात ले लीजिये – वनडे क्रिकेट के इतने बड़े इतिहास में वर्ष 2010 तक एक भी दोहरा शतक नहीं लगा लेकिन वर्ष 2010 में सचिन तेंदुलकर के दोहरा शतक लगाने के 4-5 वर्षों में ही 7 और दोहरे शतक (Double Centuries) लग गए| क्या यह मात्र संयोग था? ऐसा क्यों हुआ? ऐसा इसीलिए हुआ क्योंकि 2010 से पहले जब किसी ने दोहरा शतक नहीं लगाया था तो सभी की मानसिकता यही थी कि दोहरा शतक लगाना बहुत ही मुश्किल है| क्योंकि अभी तक इस रिकॉर्ड को किसी ने नहीं तोडा था तो यह नामुनकिन सा लगता था| लेकिन जब सचिन ने दोहरा शतक लगाया तो सभी की मानसिकता बदल गयी और यह लगने लगा कि दोहरा शतक लगाना मुश्किल है पर नामुनकिन नहीं|

यह हम पर निर्भर करता है कि हमें हाथी की तरह अपनी ही सोच का गुलाम रहना है या भौरे की तरह स्वतंत्र| अगर हम मानते है और स्वंय पर यह विश्वास करते है कि हम कुछ भी कर सकते है तो हमारे लिए नामुनकिन कुछ भी नही

Tuesday, 18 October 2016

तलाक तलाक तलाक

 तीन तलाक के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में तीन-तीन याचिकाएं डाली गई हैं. हाल ही में आर्म्ड फोर्सेज़ ट्रिब्यूनल लखनऊ ने तीन तलाक को गैर संवैधानिक बताया है. लेकिन मुस्लिम धर्मगुरु हैं कि मानने को तैयार नहीं. 
 
अब भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन नाम से खड़े हुए एक संगठन ने मुस्लिम समाज के 50 हजार लोगों के दस्तखत राष्ट्रीय महिला आयोग को भेजे हैं. इस दरख्वास्त के साथ कि तीन तलाक खत्म किया जाए. अपने समुदाय के भीतर से उठ रहे इस आंदोलन से क्या मौलानाओं की आंखें खुलेंगी? 

Friday, 23 September 2016

लगन और मेहनत = सफलता

जापान  के  एक  छोटे  से  शहर  में  रहने  वाले  एक  छोटे  से  लड़के  को  जूडो़  सीखने  का  बहुत  शौक  था ।  लेकिन बचपन  में  एक  कार  दुर्घटना  में  उसका  बायां  हाथ  कट  जाने  के  कारण  उसके  मां-बाप  उसे  जुड़ो  सीखने  के  लिए  नहीं  भेजते  थे,  लेकिन  जैसे - जैसे  वह  बड़ा  होता  जा  रहा  था । उसकी  जिद्द  भी  बढ़ती  जा  रही  थी,  आखिरी  में  उसके  मां-बाप  को  उसकी  जिद्द  के  सामने  झुकना  पड़ा ।

वह  लड़का  जापान  के  सबसे  मशहूर  मार्शल  आर्ट  मास्टर  के  पास  जूड़ो  सीखने  गया , मास्टर  ने  जब  लड़के  को देखा  तो  उन्हें  आश्चर्य  हुआ  कि  बिना  हाथ  के  लड़का  जूडो़  कैसे  सीखना  चाहता  है । उन्होंने  पूछा  तुम्हारा  तो बायां  हाथ  ही  नहीं  है । तुम  बाकी  लड़कों  का  सामना  कैसे  करोगे ।
लड़के  ने  कहा -  " मैं  तो  बस  इतना  जानता  हूं , कि  मुझे  एक  दिन  सब  को  हराना  है  और  " सेंसेई " ( मास्टर ) बनना  है ।"  मास्टर  उसकी  सीखने  की  दृढ़ इच्छा  शक्ति  से  काफी  प्रभावित  हुए  और  बोले  कि  ठीक  है । मास्टर  ने एक  साथ  50  छात्रों  को  जूडो़  सिखाना  शुरू  कर  दिया ।


लड़का  भी  अपने  अन्य  लड़कों  की  तरह जूडो़  सीख  रहा  था   पर  कुछ  दिनों  बाद  उसने  ध्यान  दिया  कि  मास्टर   अन्य  लड़कों  को  अलग-अलग  तरीके  के  दाव - पेंच  सिखा  रहे  हैं । लेकिन  वह  अभी  भी  एक  ही ( दाव )  किक  का  अभ्यास  कर  रहा  है।  उसने  मास्टर  से  कहा - " मास्टर  आप  अन्य  लड़कों  को  नई-नई  तकनीकी  सिखा  रहे  हैं  पर  मैं  अभी  भी  बस  वही  एक  किक  मारने  का  अभ्यास  कर  रहा  हूं । क्या  मुझे  कोई  अन्य  चीजें  नहीं  सीखना चाहिए ।"  मास्टर  ने  कहा -  " तुम्हें   अभी  सिर्फ  एक  किक  का  ही  अभ्यास  करना  है ।"

लड़के  ने  सोचा  शायद  मेरा  एक  हाथ  नहीं  है। इसलिए  मास्टर  ऐसा  कह  रहे  हैं लेकिन  वह  एक  ही  किक  का अभ्यास  करता  रहा , करते-करते  6 महीने  का  समय  बीत  गया  और  वह  लड़का  उसी  किक  का  अभ्यास  करता रहा । एक  बार  फिर  लड़के  को  चिंता  होने  लगी  और  उसने  मास्टर  से  कहा  क्या  अब  भी  मैं  बस  यही  करता रहूंगा  और  बाकी  सभी  लड़के  नई-नई  तकनीकों  को  सीखते  रहेंगे ।

मास्टर  ने  कहा - अगर  तुम्हें  मुझ  पर  भरोसा  है  तो  अभ्यास  जारी  रखो। लड़के  ने  मास्टर  की  आज्ञा  का  पालन करते  हुए , बिना  किसी  और  प्रश्न  किए  हुए  किक  का  अभ्यास  जारी  रखा । 6 साल  तक  वह  उसी  किक  का अभ्यास  करता  रहा । सभी  को  जुड़ो  सीखते  हुए  6  साल  हो  चुके  थे  , तब  मास्टर  ने  सभी  शिष्यों  को  एक  साथ बुलाया  और  कहा  कि  मुझे  आपको  जो  ज्ञान  देना  था , वह  मैं  दे  चुका  हूं ।

अब  गुरुकुल  की  परंपरा  के  अनुसार  सबसे  अच्छे  शिष्य  का  चुनाव  एक  प्रतियोगिता  के  माध्यम  से  किया  जाएगा  और  जो  वह  प्रतियोगिता  को  जीतेगा  उस  शिष्य  को  " सेंसेई " ( मास्टर ) कि  उपाधि  से  सम्मानित  किया जाएगा । प्रतियोगिता  शुरु  हुई  और  मास्टर  ने  लड़के  को  उसके  पहले  मैच  में  हिस्सा  लेने  के  लिए  आवाज  दि  लड़के  ने  लड़ना  शुरू  किया  और  सबको  आश्चर्यचकित  करते  हुए  उसने  अपने  पहले  तीनों  मैच  बड़ी  आसानी  से  जीत  लिए । चौथा  मैच थोड़ा  कठिन  था  लेकिन  विरोधी  ने  कुछ  समय  के  लिए  अपना  ध्यान  हटा  दिया । लड़के  को  बस  एक  ही  मौके  की  तलाश  थी , उसने  अपनी  एक  ही  अचूक  किक  को  विरोधी  के  ऊपर  लगा  दी |

लड़का  अपनी  सफलता  से  आश्चर्यचकित  हो  गया  क्योंकि , वह  फाइनल  में  अपनी  जगह  बना  चुका  था।  फाइनल में  इस  बार  विरोधी  कहीं  अधिक  ताकतवर , अनुभवी  और  विशाल  था । विरोधी  को  देख  कर  लग  रहा  था , कि लड़का  उसके  सामने  एक   मिनट  भी  ठीक  नहीं  पाएगा । मैच  शुरु  हुआ,  तो  विरोधी  लड़के  के  ऊपर  भारी  पड़  रहा  था । रेफरी  ने  मैच  को  बीच  में  रोक  कर  विरोधी  को  विजेता  घोषित  करने  का  प्रस्ताव  रखा । लेकिन  तभी  मास्टर  ने  रेफरी  को  रोकते  हुए  कहा -  कि  नहीं  मैच  पूरा  चलेगा  मैच  फिर  शुरू  हुआ  और  विरोधी  आत्मविश्वास से  भरा  हुआ  था । और  अब  वह  लड़के  को  कम  आंकने  लगा  था  और  इसीलिए  उसने  एक  बड़ी  गलती  कर  दी  उसने  अपना  गार्ड ( कवच ) छोड़  दिया ।

लड़के  ने  इसका  फायदा  उठाते  हुए,  जिस  किक  का  उसने  6 साल  से  लगातार  प्रेक्टिस  की  थी। उसने  अपनी पूरी  ताकत  और  सटीकता  के  साथ  विरोधी  के  ऊपर  जड़  दि । उस  किक  में  इतनी  शक्ति  थी,  कि  विरोधी  वही बेहोश  हो  गया, मैच  जीतने  के  बाद  लड़का  मास्टर  के  पास  गया  और  बोला  सेंसेई  भला  मैं  इतनी  बड़ी प्

खोखले बहाने

हम सब लोग बहाने बहुत बनाते है , मैं  गरीब  घर  से  आया  हूँ , मेरी  हाईट  नहीं  है , मैं  सुन  नहीं  सकता , मैं  देख  नहीं  सकता , मेरी  आवाज  खराब  है , मेरी  उम्र  बहुत  है , मेरी  उम्र  बहुत  कम  है ,   खुद  को  सहीं  साबित  करने  के  लिए लेकिन  में  आपको  बताना  चाहता  हूँ "complainer  don't  create  and  creater  don't  complaints " मतलब  जो  शिकायत  करते  है  वो  कुछ  नहीं  करते  जो  कुछ  करते  है  वो  शिकायत  नहीं  करते ।
आज  मैं  आपको  कुछ  लोगों  के  बारें  में  बताना  चाहता  हूँ :-

सबसे  पहले  भारत  कि  शान  धीरूभाई  अंबानी  चौथी  फेल  और  पेट्रोल  पंप  पर  काम  करते  थे , लेकिन  उन्होनें एक  सपना  देखा  कि  आज  भले  ही  मैं  पेट्रोल  पंप  पर  काम  कर  रहा  हूँ  लेकिन  एक  दिन  मेरी  खुद  कि रिफायनरी  होगी। शेख  चिल्ली  का  विचार  बोला  जा  सकता  है  लेकिन  दुनिया  में  वहीं  तो  सफल  होते  है  जो  शेख  चिल्ली  के  विचार  पर  काम  करते  है ।

एक  बार  उनके  दोस्तों  ने  कहा  तुम्हारी  और  हमारी  सैलरी  बराबर  है  लेकिन  तुम  उस  5 स्टार  होटल  में  जा  कर 2.5  रूपय  कि  चाय  क्यों  पीते  हो  जबकि , हम  यहाँ  ठेले  पर  25 पैसे  कि  चाय  पीते  है ,  तुन्हारें  में  एेसा  क्या घमंड़  है , तो  धीरू भाई  जवाब  देते  है  मुझे  चाय  में  कोई  समस्या  नहीं  है  चाय  पीते - पीते  जो  तुम  लोगों  कि  छोटी - छोटी  बाते  है  न  उससे  मुझे  समस्या  है  मैं  जिस  होटल  में  2.5 रूपय  कि  चाय  पीने  जाता  हूँ , वहाँ  लाखों करोड़ो  के  सौदे  कैसे  होते  है  वह  बहुत  महत्वपूर्ण  है ।

अब्रहम  लिंकन  इनको  लोग  ने  कुत्ते  कि  पुँछ  नाम  दे  दिया  था , क्योंकि  यह  सोलह  बार  चुनाव  हारे  थे । लेकिन  17 वी  बार  जब  जीते  तो  सीधे  टॉप  पर  अमेरिका  के  राष्ट्रपति  और  हम  एक  हार  से  हार  मान  लेते  हैं  यह  सोलह  बार  हारे  थे ।

अमिताब बच्चन  जो  पहली  बार  जॉब  के  लिए  ऑल  इंडिया  रेडियो  में  गए  थे , तो  उन्हें  बोला  गया  तुम्हारी  आवाज  नहीं  चलेगी  तो  अमिताब  बच्चन  ने  बोला  आवाज  नहीं  चलेगी  ऐसा  कैसे  चलेगा । फिर  एक  समय  एेसा  आया  कि इनकी  आवाज  के  बिना  कोई  फिल्म  नहीं  चलती  थी  और  बाद  में  यही  आवाज  गोल्डन  voice  के  नाम  से  जानी  जाती  है । ऐसे  महान  व्यक्ति  जो  1999  में  90 करोड़  कर्ज  के  बाद  आज  1900  करोड़  प्लस  में है । जिन्होने  दुनिया  को  बता  दिया , हम  जहाँ  से  खड़े  होते  है  लाईन  वही  से  शुरू  होती  है ।


बिल गेट  के  बारे  में  बहुत  से  लोग  बहुत  सारी  बाते  कहते  है , मैं  सिर्फ  एक  बात  बताना  चाहुँगा  कि  लोग  बोलते  है  बिल  गेट  कि  किस्मत  बहुत  अच्छी  थी ।  कि  वह  जहाँ  पर  रहता  था  उसके  पास  आधे  किलोमीटर  के  अन्दर  ही  एक  कम्प्यूटर  सेन्टर  था  तो  वह  वहाँ  जाकर  8 - 8  घन्टे   कुछ  न  कुछ  करता  रहता  था ।  तो  उसे  कम्पयूटर  कि  इतनी  जानकारी  हो  गई  लोग  बोलते  है , बिल गेट  कि  किस्मत  बहुत  अच्छी  थी  मैं  उनसे  कहना  चाहता  हूँ  बिल गेट  के  मोहल्ले  में  कोई  और  लड़का  नहीं  रहता  था  क्या , दोस्तो  किस्मत  नहीं  मेहनत  क्योंकि  बिना  मेहनत  के  हाथ  आई  कामयाबी  भी  आधे  रास्ते  से  चली  जाती  है । बिल गेट  वह  पर्सनैलिटी  है  जो  आज  अगर  काम  करना  बंद  कर  दे  तो  आने  वाले  700 सालो  तक  हर  दिन  एक  करोड़  रू  खर्च  कर  सकते  है,  लेकिन  आज  भी  वह  काम  करते  है  मैं  और  आप  कौन  है ।


जे. के. रोलिगं  वह  पर्सनैलिटी  है  दोस्तो  जिनको  उनके  पति  ने  तलाक  दे  दिया  था  तो  उनकी  एक  छोटी  बेटी  तीन  साल  कि  थी  उसे  लेकर  रोड़  पर  सोती  थी । पहले  बच्ची  को  सुलाती  बाद  में  टाईप राईटर  से  लिखती  और  दिन  में  काम  करती । इस  तरह  काम  करके  उन्होनें  1997  में  पहली  किताब  हैरी  पॉटर  को  लिखा , चार  साल  बाद वार्नर  ब्रोस  मूवीज  कि  नजर  इस  किताब  पर  पड़ी  है  एक  फिल्म  बनी  हैरी पॉटर  और  आज  इंगलैड  कि  महारानी  से  ज्यादा  कि  संपत्ती  2200 करोड़  डॉलर  कि  मालकिन  है  जे. के. रोलिंग ।


मास्टर  ब्लास्टर  सचिन  तेन्दुलकर  16  साल  कि  उम्र  में  क्रिकेट  खेलना  शुरू  किया ।  लाइफ  का  सबसे  बड़ा  अचीवमेन्ट  दसवी  में  फेल  लेकिन  आज  महाराष्ट्र  के  दसवी  कि  किताब  का  पहला  पाठ  है  तेन्दुलकर । क्रिकेट  में  बहुत  सारे  स्टेटमेन्ट  दिए  लोगों  ने  लेकिन  सचिन  ने  सारे  स्टेटमेन्ट  अपनी  बेटिंग  से  दिए ।  आज  एक  रिकार्ड  है  सचिन  के  नाम  पर  इतने  रिकार्ड  इसका  भी  एक  रिकार्ड ।


थॉमस  एडिसन  स्कूल  में  गए  टीचर  ने  घर  

Thursday, 22 September 2016

जिन्दगी में काश मैंने

जिन्दगी  में  काश  मैंने


एक  बूढ़ा  ठेकेदार  अपने  घर  के  काम  के  लिए  काफी  पहचाना  जाता  था , उसके  बनाये  हुए  घर  दूर -दूर  तक प्रसिद्द  थे . पर  अब  अधिक  उम्र  हो  जाने  के  कारण  उसने  सोचा  कि  बची  हुई  ज़िन्दगी  आराम  से  बिताई  जाए तो  वह  अगले  दिन  सुबह-सुबह  अपने  मालिक  के  पास  गया  और  बोला , ” मालिक  , मैंने  कई  सालो  तक  आपकी सेवा  की  है  पर  अब  मैं  बचा  हुअा  जीवन  आराम  से  में  बिताना  चाहता  हूँ !

 आप  मुझे  काम  छोड़ने  की  अनुमति दें .“मालिक  ठेकेदार  को  बहुत  समझाता   हैं , इसलिए  उसे  ये  बात  सुन  थोडा  दुःख  हुआ  पर  वो  ठेकेदार  को निराश  नहीं  करना  चाहता  था , उसने  ठेकेदार  से  कहा  , ” तुम  यहाँ  के  सबसे  पुराने  आदमी  हो , तुम्हारी  कमी यहाँ  पर  कोई  नहीं  पूरा  कर  सकता  है  लेकिन  मैं  तुमसे  प्रार्थना  करता  हूँ   कि  तुम  जाने  से  पहले  एक  आखिरी काम  करते  जाअो  .” “जी , क्या  काम  है ?” , ठेकेदार  ने  कहा  .“मैं  चाहता  हूँ  कि तुम  आखरी  बार  मेरे   लिए  एक और  घर  बना  दो .” , मालिक  घर  बनाने  के  लिए  पैसे  देते  हुए  बोला .ठेकेदार  इस  आखरी  काम  करने  के  लिए राजी  हो  गया .

 उसने  अगली  सुबह  से  ही  घर  बनाना  शुरू  किया , यह  सोचकर  कर  कि  ये  उसका  अंतिम  घर  है और  इसके बाद  उसे  और  कुछ  भी  नहीं  करना  होगा  वो  थोड़ा  काम  जल्दी  में  करने  लगा. पहले  जहाँ  वह  बहुत  सावधानी से  घर  बनाता  था  अब  वह  बस  काम  चालाऊ  तरीके  से  ये  सब  काम  करने  लगा . कुछ  एक  हफ्तों  में  घर बनकर  तैयार  हो  गया  और  वह  मालिक  के  पास  जाकर  बोला  , ” मालिक  , मैंने  घर  तैयार  कर  दिया  है , अब  तो मैं  काम  छोड़  कर  जा  सकता  हूँ ?” मालिक  ने  कहा  ” हाँ , तुम  जा  सकते  हो  लेकिन  अब  मैं  तुमको  तुम्हारे  पुराने  छोटे   से  घर  में  जाने  की  बिलकुल  जरूरत   नहीं   है , क्योंकि  इस  बार  जो  घर  तुमने  बनाया  है  वो  तुम्हारी  बरसों  की  मेहनत  का  इनाम  है; जाओ अपने  पूरे परिवार  के  साथ  उसमे  खुशी  से  रहो !”.!”
what is meaning of life story in Hindi

ठेकेदार  यह  सुनकर  हैरान  हो   गया , वह  अपने  मन  में  सोचने  लगा , “कहाँ  मैंने  दूसरों  के  लिए  एक  से  बढ़  कर  एक  घर  बनाये  और  अपने  घर  को  ही  इतने  घटिया  तरीके  से  बनाया  …क़ाश  मैंने  यह  घर  भी  सभी  घरों की  तरह  ही  बनाया  होता .”

दोस्तों  हम  लोग  भी  इसी  ठेकेदार  की  तरह  हर  रोज  हर  पल  अपने  सफल  भविष्य  के  लिए  ईट  जोड़  रहे  हैं मतलब  अपना  भविष्य  को  सुनहरा  बनाने  के  लिए  कुछ  काम  कर  रहे  हैं  । तो  हम  लोग  को  भी  अपना  काम इसी  तरीके  से  करना  चाहिए  कि  जैसे  वह  अपना  खुद  का  काम  हो  ताकि  हम  भी  भविष्य  में  कभी  भी  यह  ना कह  पाएँ  कि  काश  मैंने  जिन्दगी में  ऐसा  किया  होता  तो  आज  मैं  यहां  नहीं  होता  ।काश  काश  काश  यही  वह जिंदगी  के  शब्द  है , जो  हमेशा हमें  आगे  बढ़ने  से  रोकते  हैं ,क्योकि  कहानी  और फिल्मों  में  दूसरा  मौका  मिलता  हैं  जिन्दगी  में  कभी  नहीं ।

जीवन के लिए खर्च

कहानी जीवन के लिए खर्च




पत्नी  ने  कहा -  आज  धोने  के  लिए  ज्यादा  कपड़े मत  निकालना…

पति- क्यों??

उसने  कहा..- अपनी  काम  वाली  बाई  दो  दिन  नहीं
आएगी…

पति- क्यों??

पत्नी- नवरात्रि  के  लिए  अपने  नाती  से  मिलने  बेटी के  यहाँ  जा  रही  है , बोली  थी…

पति- ठीक  है, अधिक  कपड़े  नहीं  निकालता…

पत्नी- और  हाँ!!! नवरात्रि  के  लिए  पाँच  सौ  रूपए  दे दूँ  उसे ? त्यौहार  का  बोनस..

पति- क्यों ? अभी  दिवाली  आ  ही  रही  है, तब  दे
देंगे…

पत्नी- अरे  नहीं  बाबा !! गरीब  है  बेचारी,  बेटी-नाती के  यहाँ  जा  रही  है, तो  उसे  भी  अच्छा  लगेगा…  और  इस  महँगाई  के  दौर  में  उसकी  पगार  से  त्यौहार कैसे  मनाएगी  बेचारी!!

पति- तुम  भी  ना… जरूरत  से  ज्यादा  ही  भावुक  हो जाती  हो…

पत्नी- अरे  नहीं…  चिंता  मत  करो…
मैं  आज  का  पिज्जा  खाने  का  कार्यक्रम  रद्द  कर देती  हूँ…  खामख्वा  पाँच  सौ  रूपए  उड़  जाएँगे,  बासी  पाव  के  उन  आठ  टुकड़ों  के  पीछे…

पति- वा,  वा… क्या  कहने!!
हमारे  मुँह  से  पिज्जा  छीनकर  बाई  की  थाली  में??

तीन  दिन  बाद… पोंछा  लगाती  हुई  कामवाली  बाई से...

पति  ने  पूछा...
पति- क्या  बाई ?, कैसी  रही  छुट्टी?

बाई- बहुत  बढ़िया  हुई  साहब… दीदी  ने  पाँच  सौ रूपए  दिए  थे  ना .. त्यौहार  का  बोनस..

पति- तो  जा आई  बेटी  के  यहाँ…मिल  ली  अपने नाती  से…?

बाई- हाँ  साब… मजा  आया, दो  दिन  में  500  रूपए खर्च  कर  दिए…

पति- अच्छा !! मतलब  क्या  किया 500 रूपए  का??

बाई- नाती  के  लिए  150 रूपए  का  शर्ट,
40  रूपए  की  गुड़िया,
बेटी  को  50 रूपए  के  पेढे  लिए,
50  रूपए  के पेढे  मंदिर  में  प्रसाद  चढ़ाया,
60 रूपए  किराए  के  लग  गए..
25 रूपए  की  चूड़ियाँ  बेटी  के  लिए
और  जमाई  के  लिए  50 रूपए  का  बेल्ट  लिया अच्छा  सा…
बचे  हुए
75 रूपए  नाती  को  दे  दिए  कॉपी-पेन्सिल  खरीदने के  लिए…

झाड़ू-पोंछा  करते  हुए  पूरा  हिसाब  उसकी  ज़बान
पर  रटा  हुआ  था…

पति- 500 रूपए  में  इतना  कुछ???

वह  आश्चर्य से  मन  ही  मन  विचार  करने
लगा...
उसकी  आँखों  के  सामने  आठ  टुकड़े  किया  हुआ
बड़ा  सा  पिज्ज़ा  घूमने  लगा,
एक-एक  टुकड़ा  उसके
दिमाग  में  हथौड़ा  मारने  लगा…
अपने  एक  पिज्जा  के
खर्च  की  तुलना  वह  कामवाली बाई  के  त्यौहारी  खर्च से  करने  लगा…
पहला  टुकड़ा  बच्चे  की  ड्रेस  का,
दूसरा  टुकड़ा  पेढे  का,
तीसरा  टुकड़ा  मंदिर  का  प्रसाद,
चौथा  किराए  का,
पाँचवाँ  गुड़िया  का,
छठवां  टुकड़ा  चूडियों का,
सातवाँ  जमाई  के  बेल्ट  का
और  आठवाँ
टुकड़ा  बच्चे  की  कॉपी-पेन्सिल  का..
आज  तक  उसने
हमेशा  पिज्जा  की  एक  ही  बाजू  देखी  थी,
कभी  पलटाकर  नहीं  देखा  था  कि  पिज्जा  पीछे  से कैसा  दिखता  है…
लेकिन  आज  कामवाली  बाई  ने  उसे
पिज्जा  की  दूसरी  बाजू  दिखा  दी  थी…

पिज्जा  के  आठ  टुकड़े  उसे  जीवन  का  अर्थ  समझा गए  थे…


“जीवन  के   लिए  खर्च” या  “खर्च  के  लिएजीवन”


 का  नवीन  अर्थ  एक  झटके  में  उसे  समझ  आ गया…।

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आपकी कमजोरी ही ताकत हैं

  आपकी  कमजोरी  ही  ताकत  हैं

एक  नौकर  का  काम  पानी  भरना  था , वह  दूर  कुएं  से  पानी  निकलता  था । उसके  पास  दो  बड़े  मटके  थे जिसे  वह  पानी  भर  कर  एक  डंडे  में  बाध  कर  कंधे  के  दोनों  तरफ  लटकाता  था  और  अपने  मालिक  को  ले  जाकर दिया  करता  था ।

एक  मटका  सुंदर  और  साबुत  था , दूसरे  मटके  में  छोटा  सा  छेद  था ।  जिससे   थोड़ा - थोड़ा  पानी  गिरता  रहता था । मालिक  के  घर  तक  पहुंचते - पहुंचते  फूटा  मटका  आधा  खाली  हो  जाता  था, जिससे  मालिक  को  हमेशा  कम  पानी  मिलता  था , यह  सिलसिला  लगभग  2  सालों  तक  चलता  रहा । साबुत  मटके  को  अपनी  काबिलियत पर  घमंड  हो  चुका  था  और  फूटा  मटका  मन  ही  मन  शर्मिंदा  और  कमजोर  महसूस  करता  था।

एक  दिन  फूटे  मटके  ने  शर्मिंदा  और  रोते   हुए , अपने  मालिक  से  कहा  कि  मालिक  मुझे  माफ  कर  दीजिए । मैं कभी  भी  अपना  काम  अच्छे  से  नहीं  कर  पाता  हूं,  आप  मुझे  तोड़कर  फेंक  क्यों  नहीं  देते  हो , तब  मालिक  ने कहा  कि  आज  जब  हम  पानी  भरकर  वापस  आएंगे  तो  तुम  रास्ते  में  लगे  हुए  खूबसूरत  फूलों  को  जरा  गौर  से देखना  पानी  भरकर  वापस  आने  के  बाद  फिर  से  फूटे  मटके  ने  आधा  पानी  गिरने  के  लिए  माफी  मांगी ।
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मालिक  ने  कहा  तुमने  शायद  ध्यान  नहीं  दिया  कि  रास्ते  में  खूबसूरत  फूल  सिर्फ  तुम्हारी  तरफ  ही   हैं, साबुत  मटके  के  तरफ  में  नहीं । मैंने  रास्ते  के  दोनों  तरफ  इन  खूबसूरत  फूलों  के  बीज  डाल  दिए  थे , लेकिन  फूल  सिर्फ  तुम्हारी  तरफ  है । तुम  ने  दो  सालो  तक  बीजो  को  पानी  देते  रहे , मैं  उन  फूलों  के  गुलदस्ते  को  मालिक  के  घर  पर  और  मंदिर  में  सजाता  हूं।  जिससे  दोनों  खुश  रहते  हैं , यदि  तुम  न  फूटे  होते  तो  यह  फूल  के  पेड़ कभी  नहीं  होते  और  ना  ही  मालिक  के  घर  और  मंदिर  सजे  होते ।

दोस्तों  मुझे  लगता  है  कि  आज  पूरी  दुनिया  सिर्फ  कमजोरियों  पर  ही  ध्यान  देती  है,  लोग  सोचते  है  कि  मैं  यह नहीं  कर  सकता , मैं  सुन  नहीं  सकता , मैं  देख  नहीं  सकता,  मैं अमीर नहीं  हूँ , मेरे  पास  डिग्री  नहीं  है । जबकि सच्चाई  यह  है, कि  हम  सब  में  बहुत  सारी  कमजोरियाँ  है  और  हम  सब  उस  टूटे  हुए  मटके  की  तरह ही  हैं । यदि  हम  अपनी  कमजोरियों  से  ना  डरे  और  अपने  कामों  को  करते  चले  जाए , तो  हमारी  कमजोरियों  को  ही   हम  ताकत  में  बदल  देंगे  और  हमारे  पास  क्या  नहीं  है  उस  पर  रोने  के  बजाए  हम  उस  बात  के  लिए  धन्यवाद  दे  जो  हमारे  पास  है  और  उसी  को  अपनी  ताकत  बनाए ।